Thursday, October 21, 2010

मेरे दिल का छोटा साहुकार

मेरे दिल का छोटा साहुकार
बस छोटा सा ये कारोबार
बड़े प्यार सा डाली ये दुकान
बिकता जिसमें एक सामान

दाने हैं बस नाम के मेरे
बिकते नहीं हैं शाम-सवेरे
धंधे में कुछ मंदा हूँ मैं
बस पाव-भर-इश्क़ का बन्दा हूँ मैं

हाल-ए-Business ना पूछिए जनाब
कि बिखरे दानो का परिंदा हूँ मैं
क्या करूँ मैं
उठेगी अब दुकान
बिकेगा सस्ते भाव सामान
धंधे में कुछ मंदा हूँ मैं
बस नामालुम-सा बन्दा हूँ मैं
बेच ना पाऊँगा बस एक सामान
जिसपर टिकी है सारी दुकान

वो पाव-भर-इश्क़ ना बिकेगा यार
जब तक ना कोई करे उधार
अजीब है दिल कि मारा-मारी
निकल रही है क़सर हमारी
वो भी कहे तो कैसे बेचारी
उसे नामालुम है हालत हमारी

भाव लगा है मेरे दिल का आज
करें तो कैसे करें उधार
यह पाव-भर इश्क़ का कारोबार
दाना-दाना ही रहेगा यार
 
मेरे दिल का छोटा साहुकार
करे छोटा सा यह कारोबार ।
  

1 comment:

Shivani Sharma said...

hi malhar..:)
Good to see you here!
and i loved this poem...simple n charming.
How are you?
what u upto dese days?